बच्चे की पिटाई ने उजागर की तालीम की तल्ख हकीकत

मुरादाबाद।  मजदूर मोहम्मद इस्लाम के चार जवान ग्रेजुएट बेटियां हैं। घर के तीन कमरों में एक पर लेंटर पड़ा है, बाकी दो कमरों की छत पर लकड़ियों की तख्तियां बिछकर बारिश की रोकथाम को पन्नी और मिट्टी डाली गई है। बरांडा भी तख्तियों से पटा है। आंगन में मिट्टी के चूल्हे पर चूल्हे पर खिचड़ी उबल रही है। लैटरीन बाथरूम की ड्योढी पर पुराने कपड़ों का पर्दा लटका है।

जी हां यह सिर्फ एक मजदूर की झोपड़ पट्टी नहीं, बल्कि तरक्कीयाफता मुल्क की प्राइमरी स्तर की पाठशाला इकरा एकेडमी है, जो कि बाल दिवस पर एलकेजी के बच्चे की पिटाई के बाद यकायक सुर्खियों में आई। अभिभावक की तहरीर पर पुलिस ने एकेडमी संचालक बेटियों में सबसे बड़ी रूबीना को गिरफतार कर चालान कर दिया।
गुरुवार को शिक्षा विभाग की टीम जांच करने पहुंची तो शिक्षा की बुनियादी हकीकत उजागर होती नजर आई। घरनुमा स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे ही नहीं, पढ़ाने वाली बहनों के बयान व्यवस्था को झकझोरते दिखाई दिए। कल की घटना के बाद शिक्षक बहनों ने अभिभावकों की मीटिंग बुलाई थी, जोकि अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए हर संभव मदद के लिए तैयार थे। तीन कमरों में ब्लैकबोर्ड के साथ ग्लोब, भारत का नक्शा और दीगर शिक्षा से जुड़ी सामग्री करीने से लगी थी। 

दो माता-पिता, चार बहन और दो भाई घर में रहने के साथ पढ़ाई किस तरह कर लेते हैं तो बताया कि रात को कमरों को सोने के लिए इस्तेमाल कर लिया जाता है, सुबह दिन निकलने से पहले सारा सामान एक कमरे में भर दिया जाता है। पिछड़ी बस्ती है। प्रतिदिन 100 से 150 बच्चे शिक्षा ग्रहण करने आते हैं। दिनभर चारों बहने बच्चों पढ़ाती है। उनकी तालीम पाए बच्चे कांवेंट स्कूल से मुकाबला कर सकते हैं। 

लाडलों की शिक्षा से खुश होकर अभिभावक जो दान दक्षिणा दे देते हैं वही परिवार की गुजर बसर कर जरिया है। इतनी आमद भी नहीं हो पाती कि घर में गैस सिलेंडर का इंतजाम हो जाए, लिहाजा मिट्टी के चूल्हे पर खाना बनता है। उनका हर जवाब शिक्षा विभाग से लेकर सरकारी निजाम पर सवालियां निशान लगाता दिखाई दिया। नगर में नौ सरकारी स्कूल और दर्जनों मान्यता प्राप्त संस्थाएं होने के बावजूद अभिभावक झोपड़-पट्टी में खुशी से भेजते हैं, हम किसी को जबरन बुलाने नहीं आते हैं। 

पिता मजदूरी करते थे, पढ़ाई के लिए पैसे नहीं थे तो बच्चों को पढ़ाकर खुद भी तालीम हासिल की और परिवार का भी गुजर बसर किया। आज उनके कच्चे घर में जितने बच्चे शिक्षा ग्रहण करते मिले, उतने किसी सरकारी स्कूल में पंजीकृत नहीं है, जोकि शिक्षा विभाग से लेकर प्रशिक्षित अध्यापकों की कार्यशैली पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है। जहां शिक्षा विभाग प्रतिशिक्षक चालीस हजार वेतन, मिड-डे-मील और यूनीफार्म मुफत दे रहा हो, वहां अखिर अभिभावक बच्चों को सौ-पचास रुपये उलटे फीस देकर घरों में भेजने के लिए मजबूर हैं। 

अब दो चार बच्चों से शुरू तालीम का यह सिलसिला सौ को पार कर गया तो अल्पसंख्यक विभाग में मान्यता के लिए आवेदन कर दिया है। अभी मान्यता नहीं मिली है। उनसे पढ़कर बच्चे एफिडेविड बनवाकर कहीं भी स्कूल में कक्षा 6 में आसानी से प्रवेश ले लेते हैं, सो टीसी की भी जरूरत पेश नहीं आती है। 

एक बच्चे की पिटाई से इकरा एकेडमी तो सुर्खियों में आ गई, शिक्षा विभाग की भी नींद टूट गई, वरना नगर से लेकर गांवों में बेशुमार नौनिहाल मौत के साए तालीम हासिल करने के लिए मजबूर हैं। गौरतलब है कि सोमवार को जिलाधिकरी राकेश कुमार सिंह ने रामूवाला गनेश में प्राइमरी स्कूल का निरीक्षण किया तो दो सरकारी अध्यापक और दो शिक्षा मित्रों की तैनाती वाले स्कूल में 27 बच्चे पंजीकृत मिले और 13 बच्चे उपस्थित मिले थे।

बच्चों की संख्या बढ़ने पर इकरा एकेडमी के नाम से अल्पसंख्यक विभाग में मान्यता के लिए आवेदन किया था। साजिशन फंसाया गया है। वरना बच्चे शैतानी करते हैं तो हल्की फुल्की पिटाई तो कर देते हैं, मेडिकल रिपोर्ट में सत्रह स्टिक निशान मिलना गलत है। 
रूबीना, प्रिंसिपल इकरा एकेडमी
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